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Sunday, 30 March 2014

पाकीज़ा..




बस्ता खाली कर दिया
कंधे हल्के , वज़न बहुत था
निशां भी  मिटा दिए
हर कहीं से , हर चीज़ के
सिहरन कंपन और जुंबिश
समझा दिया इन्हें भी
करीब मत आना
मै थी ज़रूर
पर अब नहीं
मिलने चली हूँ
उससे मै , अकेले में
मौत “ पाकीज़ा ” है बहुत
दाग धब्बे उसे पसंद नहीं | 



Wednesday, 26 March 2014

क्रांति....



कुछ मिला है कहां
मर्ज़ी से कभी ...
विरासत में मिलता है
सबकुछ यहाँ ...
नाम ,ज़ात , माँ बाप
रूप रंग कद
वगैरह वगैरह ...
सोचती हूँ.. सब उलट पुलट दूँ
कुछ तो करूं
जिसे क्रांति कहते है ..
अपना नाम बदल दूँ
वजह पूछेगा जब कोई
तब कह देंगे ...
पुराना .. सड़ा हुआ था !

Sunday, 23 March 2014

सुनी है इसकी ...




सुनी है इसकी , हमेशा मैंने और
यकीन भी किया है , इस दिल पर  
गोल गोल घुमाकर ...इसने
आसमानों में उड़ाया है 
हवाओं को पकड़कर  
एक पैर पर चलकर
दूसरी तीसरी सातवी दुनिया
जाने कहाँ कहाँ घुमाया है ?
“पानी के छपाक” जैसे
जीना भी सिखाया है
ऊंची उड़ाने  भरने वाला
आसमान में भेजकर मुझे
खुद ज़मीन में ज़जीरे
तलाश रहा है...?
कैद होना चाहता है ?... कम्बखत
हैरान हूँ मै ..इसकी इस हरक़त पर
मै सचमुच हैरान हूँ !!!
                     श्रुति त्रिवेदी सिंह

 

Tuesday, 11 March 2014

शमशान...



 निकलते है जब उस सड़क से
बायीं तरफ जिसके शमशान है
तो ड्राईवर गाने की आवाज़
कम कर देता है हर बार
वही, जहां मौत का पहरा है ...
और सन्नाटे का शोर
आवाज़ें बेदम , आसूँ हर ओर
जब रूह भी मिट्टी
और जिस्म भी मिट्टी
फिर मिट्टी से मिलने पर  
काहे का रोना , क्यों ये बिलखना ?
पर ये कायदें है शमशान के
इन्हें मानते है सब
मत मानना कुछ भी
जाऊं मै जब ..
मेरी जिंदगी एक उत्सव है
मेरी मौत एक जश्न हो
तोड़ देना सब कायदें
कुछ भी मत करना
जी भर जिया है मैंने
जी भर के मरने देना 
प्लीज़ ....
                 श्रुति त्रिवेदी सिंह